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किसान संगठित होकर बनाएं एफपीओ, सरकार से मिलेगी 15 लाख की मदद

किसान संगठित होकर बनाएं एफपीओ, सरकार से मिलेगी 15 लाख की मदद

जानें, क्या है एफपीओ और उसकी शर्तें और नियम

केंद्र सरकार के निर्देशानुसार प्रत्येक राज्य में एफपीओ यानि किसान उत्पादक संगठन बनाए जा रहे हैं। मोदी सरकार की मंशा के अनुसार साल 2024 तक देश में करीब 10 हजार एफपीओ जाने प्रस्तावित हैं। बता दें कि केंद्र सरकार ने अच्छे रेटिंग वाले प्रत्येक एफपीओ को तीन साल में 15-15 लाख रुपए की मदद देने का ऐलान किया हुआ है। इस दिशा में हरियाणा सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा दिया गया टारगेट पूरा करते हुए राज्य में 500 एफपीओ बनाए हैं। 

इस संबंध में प्रदेश के कृषि मंत्री जेपी दलाल ने मीडिया को बताया कि एफपीओ एक ऐसी व्यवस्था है जो किसानों से फल, सब्जी, फूल, मछली व बागवानी से संबंधित फसलों को खरीदकर सीधे कंपनियों को बेचा जाता है। इसमें किसान जुड़े होते हैं और उन्हें अधिक आय प्राप्त होती है। इन एफपीओ से अब तक प्रदेश के लगभग 80,000 किसान जुडक़र लाभ प्राप्त कर रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा एफपीओ का ग्रेडेशन करने का कार्य भी शुरू कर दिया गया है। अब शानदार कार्य करने वाले एफपीओ को स्टार रेटिंग भी दी जाएगी। प्रदेश के 90 एफपीओ ऐसे हैं जिन्होंने अपने कार्यालय भी स्थापित कर लिए हैं।

 

सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1


क्या है एफपीओ  / किसान उत्पादक समूह ? 

किसान उत्पादक संगठन, असल में यह किसानों का एक समूह होता है, जो वास्तव में कृषि उत्पादन कार्य में लगा हो और कृषि व्यावसायिक गतिविधियां चलाने में एक जैसी धारणा रखते हो, एक गांव या फिर कई गांवों के किसान मिलकर भी यह समूह बना सकते हैं। यह समूह बनाकर संगत कंपनी अधिनियम के तहत एक किसान उत्पादक कंपनी के तौर पर पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकते हैं। किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) के माध्यम से जहां किसान को अपनी पैदावार के सही दाम मिलते हैं, वहीं खरीदार को भी उचित कीमत पर वस्तु मिलती है। वहीं यदि अकेला उत्पादक अपनी पैदावार बेचने जाता है, तो उसका मुनाफा बिचौलियों को मिलता है। एफपीओ सिस्टम में किसान को उसके उत्पाद के भाव अच्छे मिलते हैं, उत्पाद की बर्बादी कम होती है, अलग-अलग लोगों के अनुभवों का फायदा मिलता है।

 


यह शर्तें पूरी करने पर मिलेगी 15 लाख रुपए की सहायता

मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य विनोद आनंद ने बताया कि सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने एफपीओ बनाने के लिए जाने माने अर्थशास्त्री डॉ. वाईके अलघ के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई थी। इसके तहत कम से 11 किसान संगठित होकर अपनी एग्रीकल्चर कंपनी या संगठन बना सकते हैं। अगर संगठन मैदानी क्षेत्र में काम कर रहा है तो कम से कम 300 किसान उससे जुड़े होने चाहिए। यानी एक बोर्ड मेंबर पर कम से कम 30 लोग सामान्य सदस्य होना जरूरी है। पहले यह संख्या 1000 थी। वहीं पहाड़ी क्षेत्र में एक कंपनी के साथ 100 किसानों का जुडऩा जरूरी है। उन्हें कंपनी का फायदा मिल रहा हो। नाबार्ड कंस्ल्टेंसी सर्विसेज आपकी कंपनी का काम देखकर रेटिंग करेगी, उसके आधार पर ही ग्रांट मिलेगी। इसके अलावा बिजनेस प्लान देखा जाएगा कि कंपनी किस किसानों को फायदा दे पा रही है। वो किसानों के उत्पाद का मार्केट उपलब्ध करवा पा रही है या नहीं। कंपनी का गवर्नेंस कैसा है। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर कागजी हैं या वो काम कर रहे हैं। वो किसानों की बाजार में पहुंच आसान बनाने के लिए काम कर रहा है या नहीं। अगर कोई कंपनी अपने से जुड़े किसानों की जरूरत की चीजें जैसे बीज, खाद और दवाइयों आदि की कलेक्टिव खरीद कर रही है तो उसकी रेटिंग अच्छी हो सकती है। क्योंकि ऐसा करने पर किसान को सस्ता सामान मिलेगा।


एफपीओ से किसानों को क्या होगा लाभ

  • यह एक सशक्तिशील संगठन होने के कारण एफपीओ के सदस्य के रूप में किसानों को बेहतर सौदेबाजी करने की शक्ति देगी जिसे उन्हें जिंसों को प्रतिस्पर्धा मूल्यों पर खरीदने या बेचने का उचित लाभ मिल सकेगा।
  • बेहतर विपणन सुअवसरों के लिए कृषि उत्पादों का एकत्रीकरण। बहुलता में व्यापार करने से प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन इत्यादि मदों में होने वाले संयुक्तखर्चों से किसानों को बचत होगी।
  • एफपीओ मूल्य संवर्धन के लिए छंटाई/ग्रेडिंग, पैकिंग, प्राथमिक प्रसंस्करण इत्यादि जैसे गतिविधियां शुरू कर सकता है जिससे किसानों के उत्पादन को उच्चतर मूल्य मिल सकता है।
  • एफपीओ के गठन से ग्रीन हाउस, कृषि मशीनीकरण, शीत भंडारण, कृषि प्रसंस्करण इत्यादि जैसे कटाई पूर्व और कटाई बाद संसाधनों के उपयोग में सुविधा रहेगी।
  • एफपीओ आदान भंडारों, कस्टम केन्द्रों इत्यादि को शुरू कर अपनी व्यवसायिक गतिविधियों को विस्तारित कर सकते हैं। जिससे इसके सदस्य किसान आदानों और सेवाओं का उपयोग रियायती दरों पर ले सकते हैं।


एफपीओ किसान उत्पादक संगठन के गठन के लिए कहां से मिलेगी मदद

एफपीओ का गठन और बढ़ावा देने के लिए आप तीन संस्थाओं से मदद ले सकते हैं। इनमें लघु कृषक कृषि व्यापार संघ, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक व राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम शामिल हैं। एफपीओ गठित करने के इच्छुक किसानों को विस्तृत जानकारी के लिए संबंधित विभाग/ लघु कृषक कृषि व्यवसाय संगठन के निदेशक ( ई- मेल: [email protected]) से संपर्क कर सकते हैं।


एफपीओ के लिए कैसे करा सकते हैं ऑनलाइन पंजीकरण / किसान उत्पादक संगठन पंजीकरण

  • पंजीकरण के लिए सबसे पहले http://www.upagriculture.com पर जाएं और पंजीकरण लिंक पर क्लिक करें।
  • एक नया पेज खुलेगा जिसमें आपको ऑनलाइन पंजीकरण लिंक पर क्लिक करें।
  • अब आपके सामने एक फार्म खुलेगा, जिसमें मांगी गई सभी जानकारी भरें।
  • सभी जानकारी पूरी तरह भरने के बाद सबमिट बटन पर क्लिक कर दें।
  • इस प्रकार आपका पंजीकरण हो जाएगा। यदि आप अपनी रिपोर्ट देखना चाहते है तो पंजीकरण रिपोर्ट लिंक पर क्लिक कर देख सकते है।

 

 

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किसान आंदोलन के बीच राज्य सरकारों की किसानों को खुश करने के प्रयास

किसान आंदोलन के बीच राज्य सरकारों की किसानों को खुश करने के प्रयास

मध्यप्रदेश में मंडी शुल्क में भारी कटौती, अब 1.50 रुपए की जगह 50 पैसा लगेगा मंडी शुल्क किसान आंदोलन के बीच राज्य सरकारों की ओर से किसानों को खुश करने के प्रयास जारी हैं। हाल ही में यूपी के बाद मध्यप्रदेश ने भी अपने यहां मंडी शुल्क में भारी कटौती कर दी है। पहले यहां मंडी शुल्क 100 रुपए पर 1.50 पैसा लिया जाता था लेकिन कटौती के बाद अब किसानों को 100 रुपए पर सिर्फ 50 पैसा ही मंडी शुल्क चुकाना होगा। मध्यप्रदेश सरकार का मानना है कि इससे किसानों को काफी राहत पहुंचेगी। बता दें कि इससे पहले यूपी में आदित्नाथ योगी की सरकार ने अपने यहां मंडी शुल्क में घटाया है। यूपी में पहले मंडी शुल्क 2 रुपए लिया जाता था जिसे अब घटकर एक रुपया कर दिया गया है। यह भी आपको बताते चले कि हर राज्य में मंडी शुल्क की अलग-अलग होता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 मध्यप्रदेश में मंडी शुल्क मीडिया में प्रकाशित खबरों के हवाले से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि मध्य प्रदेश की कृषि उपज मंडियों में व्यापारियों से लिए जाने वाले मंडी शुल्क की राशि अब 1.50 रु. के स्थान पर 50 पैसे प्रति 100 रु. होगी। यह छूट 14 नवंबर 2020 से आगामी 3 माह के लिए रहेगी। मध्य प्रदेश सरकार ने गत दिनों व्यापारियों से इस संबंध में किए गए वादे को पूरा कर दिया है। व्यापारियों द्वारा मुख्यमंत्री श्री चौहान को आश्वत किया गया था कि इससे मंडियों की आय में कमी नहीं होगी। 3 महीने बाद इस छूट के परिणामों का अध्ययन कर आगे के लिए निर्णय लिया जाएगा। मंडी शुल्क : आगे भी जारी रखी जा सकती है ये छूट व्यापारियों के आश्वासन पर मंडी शुल्क में छूट दी गई है। छूट की अवधि में यदि मंडियों को प्राप्त आय से मंडियों के संचालन, उनके रखरखाव एवं कर्मचारियों के वेतन भत्तों की व्यवस्था सुनिश्चित करने में कठिनाई नहीं होती है, तो राज्य शासन द्वारा इस छूट को आगे भी जारी रखा जा सकता है। पिछले साल मंडी शुल्क से हुई थी 1200 करोड़ रुपये की आय वर्ष 2019-20 में प्रदेश की कृषि उपज मंडी समितियों को मंडी फीस एवं अन्य स्रोतों से कुल 12 सौ करोड़ रुपए की आय हुई थी। मंडी बोर्ड में लगभग 4200 तथा मंडी समिति सेवा में लगभग 29 सौ अधिकारी-कर्मचारी कार्यरत हैं तथा लगभग 2970 सेवानिवृत्त अधिकारी-कर्मचारी हैं। इनके वेतन भत्तों पर गत वर्ष 677 करोड़ रुपए का व्यय हुआ था। किसानों से क्यूं लिया जाता है मंडी शुल्क मंडी शुल्क में कटौती किसानों के द्वारा उत्पादित फसल, सब्जी, फल-फूल तथा अन्य प्रकार के उत्पाद को बेचने के लिए सभी राज्यों में मंडी शुल्क लिया जाता है। मंडी शुल्क से होने वाली आय के बदले में वहां विभिन्न व्यवस्थाएं जैसे पानी शौचालय, रुकने की व्यवस्था, गाड़ी पार्किंग की व्यवस्था शासन की तरफ से ही की जाती है। मंडी में किसानों के लिए एक अच्छे बाजार के साथ ही अन्य प्रकार की सुविधा भी दी जाती है। मंडी शुल्क का क्या होता है उपयोग आपके मन में एक बात जरूर आती है कि सरकार द्वारा लिया जाने वाला मंडी शुल्क कहां खर्च किया जाता है। तो बता दें कि मंडी शुल्क से प्राप्त आय का उपयोग राजस्थान राज्य कृषि विपन्न बोर्ड, कृषि उपज मंडी समितियों के संचालन, मंडी प्रांगणों के विकास व संचालन, कृषि विपन्न की आधारभूत संरचना विकसित करने एवं कृषकों, मजदूरों व हम्मालों आदि के लिए विभिन्न योजनाओं के संचालन करने में किया जाता है। इधर 180 टन प्याज लेकर गुवाहाटी पहुंची किसान रेल, फरवरी 2021 तक चलेगी पिछले दिनों इंदौर से 180 टन प्याज लेकर रवाना हुई किसान रेल गुवाहाटी पहुंच गई है। यह किसान ट्रेन फरवरी 2021 तक चलाई जाएगी। बता दें कि यह किसान रेल इंदौर से गुवाहाटी के लिए रवाना हुई थी। पश्चिम रेलवे की इस पहली किसान रेल को लक्ष्मीबाई नगर स्टेशन से इंदौर के सांसद श्री शंकर ललवानी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इस साप्ताहिक किसान रेल को फरवरी 2021 तक हर मंगलवार को चलाया जाएगा। 20 कोच वाली इस रेल के 18 कोच में 180 टन प्याज लादा गया। शेष 2 कोच में रास्ते के अन्य स्टेशनों से किसानों की फसल लादी गई है। इस ट्रेन का इंदौर से गुवाहाटी पहुंचने का रूट बैरागढ़, बीना, झांसी,कानपुर,लखनऊ ,बाराबंकी, हाजीपुर, कटिहार, किशनगंज और न्यू जलपाईगुड़ी जैसे प्रमुख स्टेशनों से होते हुए गुवाहाटी है। इस दौरान इस किसान रेल का इन स्टेशनों पर ठहराव होता है। उल्लेखनीय है कि भारत की पहली ‘किसान रेल’ को केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से हरी झंडी दिखाकर महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित देवलाली से बिहार के दानापुर के लिए 7 अगस्त में रवाना किया था। किसान रेल चलाने का उद्देश्य किसानों की मदद करना है। किसान रेल के माध्यम से किसान अपने कृषि उत्पादों, सब्ज़ी और फल आदि को बड़े शहरों के बाज़ार की मंडियों तक आसानी से भेज सकते हैं। इस किसान रेल से सस्ती दरों पर कृषि उत्पादों, खासतौर से जल्दी खराब होने वाली उपज के परिवहन में मदद मिलेगी, जिससे किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य दिलाने में सहायक होगी। इससे देश के किसान आत्मनिर्भर व समृद्ध होंगे। बता दें कि भारतीय रेलवे द्वारा कोविड-19 महामारी के चलते देश भर में खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 96 मार्गों पर 4,610 रेलगाडिय़ों का संचालन पीपीपी मॉडल के तहत किया जा रहा है। जिसका किराया मालगाड़ी जैसा ही होगा। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

काले गेहूं की खेती से किसान मालामाल

काले गेहूं की खेती से किसान मालामाल

जानें, कैसे की जाती है काले गेहूं की खेती (Black wheat farming ) और क्या रखनी होती हैं सावधानियां? किसानों का रूझान अब सामान्य गेहूं की तुलना में काले गेहूं के प्रति बढ़ता ही जा रहा है। इसके पीछे कारण यह है कि इस किस्म के गेहूं की बाजार मांग अधिक है और पिछले कुछ समय से इसका निर्यात भी काफी बढ़ा है। इससे किसानों का ध्यान अब काले गेहूं की खेती पर ज्यादा है। उत्तरप्रदेश में कई किसान काला गेहूं की खेती कर बंपर कमाई कर रहे हैं। कृषि अधिकारी मानते हैं कि ये गेहूं डायबिटीज वाले लोगों के लिए बहुत ही फायदेमंद है। मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश के कई जिलों में धीरे-धीरे काला गेहूं की फसल की बुवाई का रकबा बढ़ रहा है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 काले गेहूं के औषधीय गुण इसमें पाए जाने वाला एंथ्रोसाइनीन एक नेचुरल एंटी ऑक्सीडेंट व एंटीबायोटिक है, जो हार्ट अटैक, कैंसर, शुगर, मानसिक तनाव, घुटनों का दर्द, एनीमिया जैसे रोगों में काफी कारगर सिद्ध होता है। काले गेहूं रंग व स्वाद में सामान्य गेहूं से थोड़ा अलग होते हैं, लेकिन बेहद पौष्टिक होते हैं। नाबी ने विकसित की काले गेहूं की नई किस्में सात बरसों के रिसर्च के बाद काले गेहूं की इस नई किस्म को पंजाब के मोहाली स्थित नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नॉलजी इंस्टीट्यूट या नाबी ने विकसित किया है। नाबी के पास इसका पेटेंट भी है। इस गेहूं की खास बात यह है कि इसका रंग काला है। इसकी बालियां भी आम गेहूं जैसी हरी होती हैं, पकने पर दानों का रंग काला हो जाता है। नाबी की साइंटिस्ट और काले गेहूं की प्रोजेक्ट हेड डॉ. मोनिका गर्ग के अनुसार नाबी ने काले के अलावा नीले और जामुनी रंग के गेहूं की किस्म भी विकसित की है। काले गेहूं की तरह काला चावल भी होता है काले गेहूं की तरह ही काला चावल भी होता है। इंडोनेशिअन ब्लैक राइस और थाई जैसमिन ब्लैक राइस इसकी दो जानीमानी वैरायटी हैं। म्यामांर और मणिपुर के बॉर्डर पर भी ब्लैक राइस या काला चावल उगाया जाता है। इसका नाम है चाक-हाओ। इसमें भी एंथोसाएनिन की मात्रा ज्यादा होती है। अच्छी पैदावार के लिए 30 नवंबर से पहले करें बुवाई कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि मौजूदा समय काला गेहूं खेती के लिए उपयुक्त है, क्योंकि इसकी खेती के लिए खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। किसान 30 नवंबर तक की इस गेहूं की बुवाई आसानी से कर सकते हैं। अगर इसकी बुवाई देर से की जाए, तो फसल की पैदावार में कमी आ जाती है। जैसे-जैसे बुवाई में देरी होती है, वैसे-वैसे गेहूं की पैदावार में गिरावट आ जाती है। काले गेहूं का बीज : काले गेहूं की खेती कैसे करें/बुवाई का तरीका गेहूं की बुवाई सीडड्रिल से करने पर उर्वरक एवं बीज की बचत की जा सकती है। काले गेहूं की उत्पादन सामान्य गेहूं की तरह ही होता है। किसान भाई बाजार से इसके बीज खरीद कर बुवाई कर सकते हैं। पंक्तियों में बुवाई करने पर सामान्य दशा में 100 किलोग्राम तथा मोटा दाना 125 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है। वहीं छिटकाव विधि से बुवाई में सामान्य दाना 125 किलोग्राम, मोटा-दाना 150 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। बुवाई से पहले जमाव प्रतिशत अवश्य देख ले। राजकीय अनुसंधान केन्द्रों पर यह सुविधा नि:शुल्क उपलबध है। यदि बीज अंकुरण क्षमता कम हो तो उसी के अनुसार बीज दर बढ़ा ले तथा यदि बीज प्रमाणित न हो तो उसका शोधन अवश्य करें। इसके लिए बीजों का कार्बाक्सिन, एजेटौवैक्टर व पी.एस.वी. से उपचारित कर बुवाई कर लेना चाहिए। सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में रेज्ड वेड विधि से बुवाई करने पर सामान्य दशा में 75 किलोग्राम तथा मोटा दाना 100 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। खाद व उर्वरक खेत की तैयारी के समय जिंक व यूरिया खेत में डालें तथा डीएपी खाद को ड्रिल से दें। बोते समय 50 किलो डीएपी, 45 किलो यूरिया, 20 किलो म्यूरेट पोटाश तथा 10 किलो जिंक सल्फेट प्रति एकड़ देना चाहिए। वहीं पहली सिंचाई के समय 60 किलो यूरिया दें। सिंचाई काले गेहूं की फसल की पहली सिंचाई तीन हफ्ते बाद करें। इसके बाद फुटाव के समय, गांठें बनते समय, बालियां निकलने से पहले, दूधिया दशा में और दाना पकते समय सिंचाई अवश्य करें। खरपतवार नियंत्रण गेहूं के साथ अनेक प्रकार के खरपतवार उग जाते हैं। यदि इन पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो गेहूं की उपज में 10-40 प्रतिशत हानि पहुंचने की संभावना होती है। गेहूं के खेत में चौड़ी पत्ती वाले और घास कुल के खरपतावारों का प्रकोप होता है। कृष्णनील, बथुआ, हिरनखुरी, सैंजी, चटरी-मटरी, जंगली गाजर आदि खरपतवारों पर के नियंत्रण के लिए 2,4-डी इथाइल ईस्टर 36 प्रतिशत (ब्लाडेक्स सी, वीडान) की 1.4 किग्रा. मात्रा अथवा 2,4-डी लवण 80 प्रतिशत (फारनेक्सान, टाफाइसाड) की 0.625 किग्रा. मात्रा को 700-800 लीटर पानी मे घोलकर एक हेक्टर में बोनी के 25-30 दिन के अन्दर छिडक़ाव करना चाहिए। वहीं संकरी पत्ती वाले खरपतवारों में जंगली जई व गेहूंसा का प्रकोप अधिक देखा गया है। यदि इनका प्रकोप अधिक हो तब उस खेत में गेहूं न बोकर बरसीम या रिजका की फसल लेनी लेना फायदेमंद रहता है। इनके नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथेलिन 30 ईसी (स्टाम्प) 800-1000 ग्रा. प्रति हेक्टर अथवा आइसोप्रोटयूरॉन 50 डब्लू.पी. 1.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर को बोआई के 2-3 दिन बाद 700-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिडक़ाव करना चाहिए। इकसे बाद खड़ी फसल में बोआई के 30-35 दिन बाद मेटाक्सुरान की 1.5 किग्रा. मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिडक़ाव करना चाहिए। मिश्रित खरपतवार की समस्या होने पर आइसोप्रोट्यूरान 800 ग्रा. और 2,4-डी 0.4 किग्रा. प्रति हे. को मिलाकर छिडक़ाव करना चाहिए। गेहूं व सरसों की मिश्रित खेती में खरपतवार नियंत्रणके लिए पेन्डीमिथालिन का छिडक़ाव किया जा सकता है। कटाई व प्राप्त उपज जब गेहूं के दाने पक कर सख्त हो जाएं और उनमें नमी का अंश 20-25 प्रतिशत तक आ जाए तब इसकी फसल की कटाई करनी चाहिए। बात करें इसकी प्राप्त उपज की तो इसकी 10 से 12 क्विंटल तक प्रति बीघे उपज प्राप्त की जा सकती है। कितनी हो सकती है कमाई काले गेहूं की मार्केट में 4,000 से 6,000 हजार रुपए प्रति क्विंटल की कीमत पर बिकता है, जो कि अन्य गेहूं की फसल से दोगुना है। इसी साल सरकार ने गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,975 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है। इस हिसाब से देखें तो काला गेहूं की खेती से किसानों की कमाई तीन गुना तक बढ़ सकती है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

खुरपका-मुंहपका रोग : सरकार ने पशुओं के टीकाकरण पर लगाई रोक

खुरपका-मुंहपका रोग : सरकार ने पशुओं के टीकाकरण पर लगाई रोक

पशुओं का टीकाकरण रोका : जानें, क्या है कारण और किन राज्यों में लगाई गई हैं रोक सरकार ने पशुओं में होने वाले खुरपका-मुंहपका रोग के टीकाकरण पर रोक लगा दी है। अब पशुओं को इस रोग का टीका नहीं लगाया जाएगा। दरअसल इस रोग के टीकाकरण के प्रयोग में आने वाली वैक्सिन की गुणवत्ता मानक के अनुरूप नहीं होने के कारण केंद्र सरकार ने झारखंड सहित कोई आधा दर्जन राज्यों को इसका इस्तेमाल न करने की सलाह दी थी। केंद्र के निर्देश के बाद झारखंड राज्य सरकार ने जिला पशुपालन अधिकारियों को रोक का आदेश जारी कर दिया है। हैदराबाद की एक कंपनी ने दवा की आपूर्ति की थी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की इकाई आरवीआरआइ से वैक्सिन की जांच कराई गई थी जिसमें गुणवत्ता मानक के अनुसार नहीं पाया गया था। बता दें कि बीते साल झारखंड के टंडवा व करीबी इलाके में इस रोग से अनेक जानवरों की मौत हो गई थी। केंद्र से समय पर निर्देश व दवा का इंतजाम नहीं होता है तो बीमारी फैलने पर पशुपालकों का बड़ा नुकसान हो सकता है। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 किन राज्यों में लगाई पशुओं के टीकाकरण पर रोक / खुरपका-मुंहपका रोग का टीकाकरण झारखंड सहित जिन अन्य प्रदेशों में टीकाकरण पर रोक लगाई गई है वे हैं पंजाब, राजस्थान, असम, दमन व जम्मू कश्मीर। सरकारी सूत्रों के अनुसार प्रदेश में करीब 30 लाख जानवरों का टीकाकरण किया जाना है। राज्य के 24 में 22 जिलों में टीकाकरण का काम प्रारंभ हो गया था। करीब 70 हजार जानवरों को टीके लगाये जा चुके थे इसी बीच रोक का आदेश आ गया है। कृषि एवं पशुपालन सचिव अबु बकर सिद्दीकी का कहना है कि केंद्र से पुन: निर्देश के अनुसार टीकाकरण का काम शुरू होगा। क्या है खुरपका-मुंहपका रोग खुरपका-मुंहपका रोग जिसे झारखंड की स्थानीय भाषा में खुरहा-चपका रोग भी कहते हैं, मूलत: दो खुर वाले गाय, भैंस, बैल, सांड, भेंड, बकरियों में होता है। ऐसे में इनका चलना और खड़े होना और खाना मुश्किल होता है। तेज बुखार होने के कारण जानवर खाना-पीना और जुगाली करना भी बंद कर देते हैं। बच्चों पर ज्यादा बुरा असर होता है। यह अति संक्रामक रोग है। वयस्क पशुओं की क्षमता कम कर देता है और इसके विषाणु लंबे समय तक जीवित रहते हैं। पशुओं में कैसे फैलता है ये रोग चिकित्सकों के अनुसार रोग अत्यन्त सूक्ष्म विषाणु से फैलता है। जिसमें ओ, ओ, ए, सी, एशिया-1, एशिया-2, एशिया-3, सैट-1, सैट-3 और इनकी 14 उप-किस्में मुख्य है। देश में यह रोग मुख्यत: ओ, ए, सी तथा एशिया-1 प्रकार के विषाणुओं द्वारा अपने पांव पसारता है। पशुओं में रोग फैलने का एक अन्य कारण नम-वातावरण, पशु की आंतरिक कमजोरी, पशुओं का स्थान बदलने क्षेत्र में रोग का प्रकोप भी इस बीमारी को फैलाने में सहायक हैं। खुरपका मुहंपका रोग ग्रसित पशु की कैसे करें देखभाल बीमारी हो जाने पर रोग ग्रस्त पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग करके रखें। बीमार पशुओं की देख-भाल करने वाले व्यक्ति भी स्वस्थ पशुओं के बाड़े से दूर रहे। बीमार पशुओं के आवागमन पर रोक लगा दे। पशु बाड़े की समय-समय पर सफाई करें। इस बीमारी से मरे पशु के शव को खुला छोडक़र गाड़ दें ताकि वायरस ना फैले। टीका नहीं लग रहा तो कैसे कर सकते हैं रोग ग्रसित पशु का उपचार / खुरपका - मुंहपका रोग का इलाज जिन राज्यों में पशुओं के टीकाकरण पर रोक लगाई गई है वहां के पशुपालक चिकित्सक की सलाह लेकर उपचार करवा सकते हैं। चिकित्सकों के अनुसार मुंह खुरों के घावों को फिटकरी या पोटाश के पानी से धोते है। मुंह में बोरो-ग्लिसरीन तथा खुरों में किसी एंटीसेप्टिक लोशन या क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : चार दोस्तों ने किया कमाल, बिना मिट्टी के उगा दी ये सब्जियां

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग : चार दोस्तों ने किया कमाल, बिना मिट्टी के उगा दी ये सब्जियां

जानें, क्या है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग / बिना मिट्टी के खेती की तकनीक कोरोना संक्रमण के दौर में सरकार का सबसे अधिक ध्यान कृषि की ओर गया है। इस दौरान जहां सभी व्यवसाय ठप हो गए, वहीं कृषि व्यवसाय ने लोगों को काफी राहत पहुंचाई। किसान ने अन्नदाता बनकर देश के लोगों की खाद्य संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया। कोरोना संक्रमण के दौर में बंपर फसल का उत्पादन हुआ जो अन्य वर्षों की तुलना में काफी अधिक रहा। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए अधिक से अधिक बजट का उपयोग कृषि क्षेत्र में करने का मन बनाया हुआ है। सरकार का फोकस कृषि पर होने से लोगों की रूचि भी खेतीबाड़ी के काम की ओर होने लगी है। इस दौरान खेती में कई नवाचार भी किए जा रहे हैं। सबसे पहले सरकार की सभी योजनाओ की जानकारी के लिए डाउनलोड करे, ट्रेक्टर जंक्शन मोबाइल ऍप - http://bit.ly/TJN50K1 बिना मिट्टी के खेती आज कई पढ़े-लिखे युवक खेती को व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं जिसके उन्हें काफी सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। इसी कड़ी में हाल ही में उदयपुर के चार दोस्तों ने खेती में एक नवाचार किया है जो काफी सराहनीय है। मीडिया में प्रसारित जानकारी के अनुसार कोरोना काल में ट्यूरिज्म व्यवसाय ठप होने के बाद उदयपुर के इन चार दोस्तों दिव्य जैन, भूपेन्द्र जैन, रौनक और विक्रम ने खेती में नई तकनीक के साथ भाग्य आजमाया है। यह नई तकनीक इसलिए खास है जिसकी चर्चा चारों ओर हो रही है। दरअसल उदयपुर शहर के इन चारों दोस्तों ने बिना मिट्टी के खेती करने की शुरुआत की है जो काफी दिलचस्प होने के साथ आश्चर्यचकित करने वाली भी है। भला बिना मिट्टी के खेती कैसे हो सकती है। पर ऐसा संभव कर दिखाया है उदयपुर के इन चारों दोस्तों ने। क्या है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग (Hydroponic farming at home) हाइड्रोपोनिक्स का मतलब होता है जलीय कृषि। यानि इस खेती में फसल पानी में उगाई जाती है और इसमें मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता। खेती की इस आधुनिक तकनीक में फसल पानी और उसके पोषण स्तर के जरिए बढ़ती है। भारत के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पानी की कमी रहती है लेकिन इस तकनीक से सामान्य तकनीक की अपेक्षा सिर्फ 10 प्रतिशत पानी की जरूरत पड़ती है, साथ ही मिट्टी की भी कोई जरूरत नहीं होती। बस सूर्य का प्रकाश फसल को मिलता रहना चाहिए। लेकिन जहां सूर्य की रोशनी नहीं पहुंच पाती वहां कस्टमाइज्ड तरीके से रोशनी की व्यवस्था की जाती है। इन चारों दोस्तों ने इसी तकनीक को आधार बनाकर उदयपुर शहर से 12 किमी दूर दस हजार वर्गफीट की जमीन पर ऑटोमेटेड फार्म बैंक टू रूट्स तैयार की और बिना मिट्टी के खेती करने लगे। इसके माध्यम से ये ओक लेट्यूस, ब्रॉकली, पाक चाय, चैरी-टोमेटो, बेल पेपर और बेसिल की खेती कर रहे हैं। इन सब्जियों की सबसे ज्यादा मांग पांच सितारा होटल्स में होती है और पर्यटक इन्हें पसंद भी करते हैं। कैसे की जाती है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग (Hydroponic farming) बिना मिट्टी के पानी से होने वाली इस फार्मिंग को करने के लिए उदयपुर के इन चारों दोस्तों ने रिसर्च किया और फिर उदयपुर में पॉली हाउस बनाकर उसमें खेती शुरू कर दी। इस खेती में मिट्टी का कहीं भी उपयोग नहीं किया गया है। इसमें तापमान को स्थिर रखते हुए पौधों की जड़ तक पाइप से पानी पहुंचाया जाता है और उसी से पोषक सब्जियों की पैदावार होती है। हाइड्रोपोनिक खेती में बीज बोने से लेकर बढऩे तक की एक अलग प्रक्रिया होती है। ये पौधे छोटे प्लास्टिक के कप- ए आकार की फ्रेम में कतार में रखे जाते हैं। इससे पौधों की जड़ में जरूरत के अनुसार पानी चलता रहता है। इस पानी में न्यू्ट्रेंट सोल्यूशन मिलाए जाते हैं ताकि पौधों को जरूरी पोषक तत्व मिलते रहें। पॉली हाउस में तैयार किए जाने वाले इन पौधों को पानी के पाइप से पहुंचाया जाता है। पौधे पॉली हाउस में 27 से 30 डिग्री तक तापमान मेंटेन करके रखा जाता है। पेस्ट्रीसाइड्स का इस्तेमाल नहीं होने से गुणवत्तापूर्ण उत्पादन / हाइड्रोपोनिक उर्वरक यह खेती इसलिए भी लोगों के लिए चर्चा का विषय बन चुकी है कि इस तकनीक से खेती में पेस्ट्रीसाइड्स का बिलकुल भी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इससे गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिल रहा है। इस फार्मिंग के सकारात्मक नतीजे मिल रहे हैं। इससे दो माह की अवधि के दौरान ऐसी फसल तैयार हो चुकी है। इस सब्जी से बनने वाली चीजें स्वादिष्ट होने के साथ ही सेहत के लिए भी फायदेमंद है, जिसे पांच सितारा होटल्स में नाश्ते और फास्ट फू्रड में सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है। अगर आप अपनी कृषि भूमि, अन्य संपत्ति, पुराने ट्रैक्टर, कृषि उपकरण, दुधारू मवेशी व पशुधन बेचने के इच्छुक हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा खरीददार आपसे संपर्क करें और आपको अपनी वस्तु का अधिकतम मूल्य मिले तो अपनी बिकाऊ वस्तु की पोस्ट ट्रैक्टर जंक्शन पर नि:शुल्क करें और ट्रैक्टर जंक्शन के खास ऑफर का जमकर फायदा उठाएं।

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