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पशु चारा : विज्ञानियों ने विकसित की पशुचारे के लिए जई की दो नई किस्में

पशु चारा :  विज्ञानियों ने विकसित की पशुचारे के लिए जई की दो नई किस्में

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की उपलब्धि : दुधारू पशुओं को मिलेगा पोषण, दूध बढ़ाने में सहायक

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञानियों ने जई की दो नई उन्नत किस्मों को विकसित किया है। ये किस्में ओएस 405 व ओएस 424 हैं, जिन्हें विश्वविद्यालय के अनुवांशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के चारा अनुभाग द्वारा विकसित किया गया है। भारत सरकार के कृषि एवं कल्याण मंत्रालय के कृषि एवं सहकारिता विभाग ने इसके प्रयोग की अनुमति भी दे दी है। बैठक की अध्यक्षता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के फसल विज्ञान के उप-महानिदेशक डॉ. टीआर शर्मा ने की। विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एसके सहरावत ने मीडिया को बताया कि इन किस्मों में अन्य किस्मों की तुलना में प्रोटीन अधिक है, जो पशु के दुग्ध उत्पादन में बढ़ोतरी करती है। ये किस्में उत्पादन व पोषण की दृष्टि से बहुत ही बेहतर हैं।

 

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ओएस 405 की खासियत

विश्वविद्यालय की ओर से मीडिया दी गई जानकारी के अनुसार ओएस 405 किस्म को भारत के मध्य क्षेत्र मुख्यत: महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य यूपी के लिए सिफारिश की गई है। ओएस 405 किस्म में हरे चारे के लिए प्रसिद्ध किस्म कैंट व ओएस 6 की तुलना में 10 प्रतिशत तक अधिक हरा चारा मिलता है। इसी प्रकार इन किस्मों की तुलना में सूखे चारे की पैदावार भी 11 फीसद तक अधिक है। इस किस्म में हरे चारे की उपज 513.94 क्विंटल प्रति हेक्टेयर व सूखे चारे की उपज 114.73 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती है। इससे लगभग 15.39 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बीज प्राप्त किया जा सकता है। ये किस्म पत्ता झुलसा रोग के प्रति प्रतिरोधी है।

 


ओएस 424 की खासियत

ओएस 424 किस्म को पहाड़ी क्षेत्र जिसमें हिमाचल,जम्मू-कश्मीर व उत्तराखंड के लिए सिफारिश किया गया है। ये किस्म भी पत्ता झुलसा रोग के प्रति प्रतिरोधी हैं। ओएस 424 किस्म में हरे चारे की पैदावार 296.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर व सूखे चारे की पैदावार 65.1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक आंकी गई है। ओएस 424 किस्म से लगभग 13.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बीज प्राप्त किया जा सकता है। बता दें कि इससे पहले भी विश्वविद्यालय के चारा अनुभाग के वैज्ञानिकों द्वारा विश्वविद्यालय की स्थापना से लेकर अब तक 9 किस्में विकसित की जा चुकी हैं, जो अपने आप में इस क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि है।


दुधारू पशुओं को खिलाने योग्य अन्य पौष्टिक चारे

  • लूसर्न और बरसीम - ये दोनों तरह के चारे स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी है। इनमें प्रोटीन की मात्रा 15-20 प्रतिशत होती है।
  • दुब, हलीम और झरूआ आदि अन्य प्रकार की घासे अच्छी होती हैं। इनमें दूब सर्वश्रेष्ठ है। झरूआ भी एक अच्छी और दानेदार घास है।
  • जौ तथा जई की चरी - ये पौधे दुग्धवर्धक हैं। जौ का तो सूखा भूसा भी खिलाया जा सकता है, किंतु जई का भूसा कम अच्छा होता हैं।
  • ज्वार की चरी - यह चारों में सर्वोत्तम हैं, क्योंकि इसे हरी, सूखीं या साइलेज-रूप में सभी तरह से खिलाते हैं। परन्तु हरी चरी ही उत्तम चारा माना जाता है।
  • मक्का - गर्मी के दिनों में साइलेज के अतिरिक्त यही एक हरे चारा के रूप में उपलब्ध हो सकती है जिसे पानी व का प्रबंध करके चैत्र माह में बो दें और ज्येष्ठ से भाद्र पद तक ग्वार और लौबिया के पौधों के साथ मिलाकर खिलाये।
  • ग्वार और लोबिया - चैत से भादो माह तक इसे बोये और मक्का की चरी के साथ खिलाए।
  • सरसों की चरी- हरी नरम और सिंगरीदार सरसों को । दूसरे चारों के साथ मिलाकर खिलाने पर दूध की मात्रा में बढ़ोत्तरी होती हैं एवं गर्म-तासीर होती है।
  • मटर - नर्म फलियों के भर आने पर इसे खिलाये। इसमें कार्बोहाइड्रेट बहुत होते हैं, एवं इसे जौ आदि के चारे या भूसे के साथ में मिलाकर ही खिलाना चाहिये।
  • चना और मसूर - चने के पौधे में क्षार की बहुत अधिकता होने के कारण इसे दूसरे चारों के साथ मिलाकर ही खिलाना चाहिये।
  • उरद तथा मूंग - इसे भादों से कार्तिक माह के बीच बोना चाहिए और नरम फल लग जाने के बाद अन्य चारों के साथ मिलाकर खिलाये। क्योंकि इसमें प्रोटीन की मात्रा बहुत अधिक होती है जो की दूध की पौष्टिकता को बढ़ाता है।

 

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दुधारू पशुओं को खिलाने योग्य दाने

  • गेहूं का दलिया और चोकर बहुत ही उपयोगी हेता है।
  • खली: सरसों और लाही, तिल, मूंगफली, अलसी तथा बिनौले आदि को खिलाने से दूध की मात्रा एवं पौष्टिकता में वृद्धि होती है।
  • चने का दाना और चूनी मिली हुई भूसी, अरहर की चुनी भूसी, मूंग की चुनी भूसी, मसूर की चूनी भूसी इन सभी को मिलाकर खिलाना चाहिए क्योंकि इन सभी में प्रोटीन प्रधान तत्व अत्यधिक होते हैं और भूसी में फासफोरस का काफी अंश होता है। जो दूध की उत्पादन, क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है।
  • जौ का दलिया खिलाना अत्यन्त लाभकारी माना जाता है।
  • गुड़ और शीरा थोड़ी मात्रा में खिलाना हितकर होता है।
  • पकाई हुई चीजें जैसे-दाल का पानी, चावल का माँड़, रोटी और थोड़ा-सा दलिया भी दिया जाना चाहिये।
  • कुछ मात्रा में ग्वार को दलकर और उबालकर या भिगोकर देना चाहिए।

 

 

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